नोरा फतेही के गाने पर विवाद, धार्मिक नेताओं ने अश्लील साहित्य पर आपत्ति जताई

मुंबई। कन्नड़ फ़िल्म ‘KD: The Devil’ के गाने ‘सरके चुनर तेरी सरके’ को लेकर काफ़ी तीखी बहस छिड़ गई है। इसी बीच, अलीगढ़ स्थित एक धार्मिक संगठन, ‘मुस्लिम पर्सनल दारुल इफ़्ता’ ने इस गाने में नज़र आने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री नोरा फ़तेही के ख़िलाफ़ एक फ़तवा जारी कर दिया है।
संगठन का कहना है कि इस गाने के बोल इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत हैं। उन्होंने अपने फ़तवे में साफ़ तौर पर कहा है कि इस तरह के प्रदर्शन समाज को, और ख़ास तौर पर मुस्लिम युवाओं को, एक ग़लत संदेश देते हैं। दूसरी ओर, पूरे देश में इस गाने के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए, केंद्र सरकार ने इस गाने पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में इस बात की पुष्टि की।
वहीं दूसरी तरफ़, नोरा फ़तेही ने इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस गाने के हिंदी संस्करण से उनका कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने बताया कि तीन साल पहले उन्हें संजय दत्त जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ काम करने का अवसर मिला था। यह गाना ‘नायक नहीं खलनायक हूँ मैं’ जैसे मशहूर गाने का रीमेक था, और उन्होंने इसी वजह से इसमें काम करने की सहमति दी थी। उन्होंने आगे बताया कि उन्हें कन्नड़ भाषा नहीं आती थी, और उस समय फ़िल्म निर्माताओं द्वारा दिए गए अनुवाद में उन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा था। 1970 के दशक के बैंगलोर की पृष्ठभूमि पर आधारित फ़िल्म ‘KD: The Devil’ का निर्देशन प्रेम ने किया है, और इसमें ध्रुव सर्जा मुख्य भूमिका में नज़र आएंगे। यह फ़िल्म 30 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली है।
फ़तवा जारी होने पर क्या होता है?
फ़तवा दरअसल किसी भी मामले पर इस्लामी विद्वानों द्वारा दी गई एक व्याख्या या राय होती है। उदाहरण के लिए, यदि उन्हें लगता है कि कोई गाना या फ़िल्म इस्लामी नियमों के विरुद्ध है, तो वे एक फ़तवा जारी कर सकते हैं। इस फ़तवे में यह कहा जा सकता है कि उस गाने या फ़िल्म को नहीं देखा जाना चाहिए, या फिर यह कि वह ग़लत है।
हालाँकि, ऐसी संभावना रहती है कि लोग इस फ़तवे का सम्मान करें और संबंधित व्यक्ति या चीज़ से दूरी बना लें। इससे उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँच सकती है, या उसे सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन, भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में, फ़तवे को कोई भी क़ानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है। केवल फ़तवा जारी हो जाने भर से, पुलिस किसी को गिरफ़्तार नहीं कर सकती और न ही अदालतें इसे किसी तरह का फ़ैसला मान सकती हैं। संविधान के अनुसार, देश के क़ानून ही सर्वोपरि होते हैं।



