विभाजन की विभीषिका : कैसे फिल्मी गीतों में रोया हिन्दुस्तान

भारत का विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था। 1947 में एक राजनीतिक सीमा खींची गई, लेकिन उसके साथ करोड़ों मनुष्यों के जीवन, परिवार, स्मृति यों और संबंधों पर भी एक ऐसी रेखा खिच गई जिसकी पीड़ा पीढ़ियों तक बनी रही। अभी भी हजारों परिवारों में वो कसक शेष है। उनके घर छूटे, गाँव छूटे, खेत-खलिहान छूटे, रिश्ते छूटे और सबसे बढ़कर वह मिट्टी छूट गई जिसे लोग अपना देश, अपना वतन कहते थे।विभाजन की त्रासदी को इतिहास की पुस्तकों में आँकड़ों, घटनाओं और राजनीतिक निर्णयों के माध्यम सेपढ़ा जासकता है; लेकिन उसकी मानवीय पीड़ा को समझनेके लिए साहित्य, कविता, कहानी और सिनेमा की ओर देखना पड़ता है। हिन्दी सिनेमा ने विभाजन को अनेक बार परदे पर उतारा और फिल्मी गीतों ने उस पीड़ा को ऐसी भावनात्मक भाषा दी, जिसे सुनकर आज भी विस्थापन की वेदना को अनुभूत किया जा सकता है।वि भाजन के बाद बनेभारत और पाकिस्तान के बीच सीमा भलेही निश्चि त हो गई, लेकिन स्मृति यों की कोई सीमा नहीं बनी। गीतों में बार-बार वही प्रश्न लौटता रहा—जिस घर को अपना समझकर जीवन बिताया, उसे अचानक पराया कैसे मान लें?“वतन” जब एक स्मृति बन गयास्वतंत्रता से पहले‘वतन’ शब्द का अर्थ था—अपनी धरती, अपना देश और स्वतंत्रता की आकांक्षा। लेकिनवि भाजन के बाद ‘वतन’ का एक नया अर्थ उभरा—वह जगह जहाँमनुष्य का बचपन बीता था।अब वतन केवल भारत या पाकि स्तान नहीं था। कि सी के लि ए लाहौर वतन था, कि सी के लि ए अमृतसर, कि सी के लि ए रावलपिडी, मुल्तान, पेशावर, ढाका या कराची। किसी के लिए वतन वह गाँव था जहाँ पीढ़ि यों सेघर खड़ा था। यही कारण है कि विभाजन पर बनेअनेक गीतों मेंराष्ट्र की तुलना में घर, माँ, मिट्टी, गलि याँ, बचपन और बिछुड़े रिश्ते अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। विभाजन की सबसेबड़ी त्रासदी यही थी कि लाखों लोगों को यह निर्णय स्वयं नहीं लेना था कि उनका घर कहाँ होगा। सीमाओं ने उनके लिए तय कर दिया कि वे अब कहाँ के नागरिक हैं।वतन की राह मेंवतन के नौजवान शहीद हो…’1948 की फिल्म ‘शहीद’ स्वतंत्रता के तुरंत बाद आई महत्वपूर्ण फि ल्मों मेंथी। इसका गीत— “वतन की राह मेंवतन के नौजवान शहीद हो…” स्वतंत्रता और बलि दान की भावना का गीत था। लेकि न 1947 के बाद ‘वतन’ शब्द का भाव और भी जटि ल हो गया था। स्वतंत्रता मि ली थी, मगर उसी स्वतंत्रता की कीमत वि भाजन और वि स्थापन के रूप में भी सामने आई।एक ओर स्वतंत्रता का पर्व था, दूसरी ओर शरणार्थि यों की बि लखती टोलि याँ। एक ओर अपना ति रंगा लहरा रहा था, दूसरा ओर अपनेघरों सेउजड़ेलोग अपनेभवि ष्य की तलाश मेंभटक रहेथे। यही भारतीय इति हास का वहवि रोधाभास हैजि सेकेवल राजनीति क घटनाओं से नहीं समझा जा सकता।‘ऐ मेरे प्यारे वतन…’विभाजन की पीड़ा को सीधे-सीधे व्यक्त करने वाले गीतों में फि ल्म ‘काबुलीवाला’ (1961) का गीत “ऐ मेरे प्यारेवतन, तुझ पे दिल कुर्बान” अत्यंत महत्वपूर्ण है।यह गीत वास्तव में अफगानिस्तान पूर्व का गांधार से दूर रह रहेएक व्यक्ति की मातृभूमि के प्रति भावनात्मकपुकार है। लेकिन विभाजन के बाद के भारतीय मानस ने इसमें अपने बिछड़े हुए वतन की पीड़ा भी महसूस की।जब कोई व्यक्ति अपनी जन्मभूमि सेहजारों मील दूर हो जाता है, तो ‘वतन’ भौगोलिक स्थान नहीं रहता—वहस्मृति बन जाता है। और स्मृति को कोई सीमा नहीं रोक सकती। यही कारण है कि यह गीत विभाजन की सामूहि क स्मृति के संदर्भ मेंभी मार्मि क प्रतीत होता है।‘वो सुबह कभी तो आएगी’साहिर लुधियानवी की कविता और फिल्मी गीतों में स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक बेचैनी दिखाई देती है। “वो सुबह कभी तो आएगी…” यह केवल भवि ष्य की आशा नहीं है; यह उस पीढ़ी की आकांक्षा है जिसने स्वतंत्रता देखी, लेकि न स्वतंत्रता के साथ गरीबी, वि स्थापन, हिसा और सामाजिक असमानता भी देखी।विभाजन के बाद करोड़ों लोगों के सामने एक नया जीवन शुरू करने की चुनौती थी। उनके लिए आजादी का अर्थकेवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था; वह सुरक्षित घर, सम्मानजनक जीवन और अपने पन की तलाश भी थी।इसलि ए उस समय के गीतों मेंउत्सव के साथ-साथ उम्मीद और पीड़ा दोनों साथ चलते हैं।‘जिन्हें नाज़ है हि न्द पर…’सिनेमा ने विभाजन की पीड़ा को केवल वि स्थापि तों की कहानी बनाकर नहींछोड़ा। उसनेस्वतंत्रता के बाद पैदा हुईसामाजिक विषमताओं पर भी प्रश्न उठाए।साहिर की रचनाओं में यह प्रश्न बार-बार दिखाई देता है कि यदि देश स्वतंत्र हो गया है तो क्या हर नागरिक स्वतंत्र,सुरक्षित और सम्मानित भी हुआ?यही प्रश्न ‘प्यासा’ जैसे सिनेमा में दिखाई देता है। वि भाजन के बाद का भारत केवल राष्ट्रनि र्मा ण का भारत नहीं था; वह अपनेआपको (स्व, चि त्ति ) खोजता हुआ भारत भी था।‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…’‘प्यासा’ (1957) का संसार सीधेवि भाजन की कहानी नहींकहता, लेकि न उसके भीतर युद्धोत्तर और विभाजनोत्तर समाज की बेचैनी सुनाई देती है। साहिर लुधि यानवी की दृष्टि मेंमनुष्य की कीमत धन और सत्ता से बड़ी है।विभाजन ने मनुष्य को अचानक ‘शरणार्थी ’, ‘हिन्द’ू, ‘मुस्लिम’, ‘सि ख’, ‘भारतीय’ या ‘पाकिस्तानी’ जैसी पहचान में बाँट दिया था। लेकिन उसके पहले वह एक मनुष्य था—जि सका घर था, परिवार था, पड़ोसी थे और स्मृति याँथीं।विभाजन के गुनहगार कौन? क्या सिनेमा की कला एवं मनोरंजन की मानवीय दृष्टि इस मूल सत्य को बार-बारयाद दिला सकी? ऐसे कुछ प्रश्न भी मन में चिरस्थायी हैं।‘अजीब दास्तां है ये…फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ (1960) का गीत— “अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहाँख़तम…” विभाजन पर लिखा गीत नहीं है, लेकिन इसके भाव विभाजन की कहानी को समझने में अद्भुत रूपक बन जाते हैं।विभाजन भी ऐसी ही एक ‘अजीब दास्तान’ था। एक दि न तक जो पड़ोसी थे, वेअचानक दूसरी ओर के लोग हो गए। जो घर अपना था, वह पराया हो गया। जो मार्ग नि त्य का था, वह सीमा के उस पार चला गया। और जि न रिश्तों को पीढ़ियों ने बनाया था, वे राजनीति के एक निर्णय से टूट गए।‘घर आया मेरा परदेसी…भारतीय सिनेमा में घर लौटने का भाव बार-बार आता है। लेकि न वि भाजन की पीढ़ी के लि ए घर लौटना हमेशासंभव नहीं था। कई लोगों के घर अब दूसरे देश में थे। कई घरों में दूसरे लोग बस चुके थे। कई घर जल चुके थे। कई घरों का केवल नाम बचा था।इसलि ए फि ल्मी गीतों में ‘घर’ का भाव वि भाजन के बाद वि शेष रूप सेमार्मि क बन जाता है। घर केवल चार दीवारें नहीं था। घर था—आँगन, नीम का पेड़, पड़ोसी, मंदि र-गुरुद्वारे, मठो की आवाजें, खेत, कुआँ, स्कूल, बाजार और बचपन की स्मृतियाँ। जब यह सब छूट गया, तो वि स्थापन केवल स्थान परि वर्तन नहीं रहा; वह स्मृति का स्थायी घाव बन गया।‘कर चलेहम फ़िदा…’ और वि भाजन के बाद का सैनिक1964 की फिल्म ‘हकीकत’ का गीत— “कर चलेहम फ़ि दा जान-ओ-तन साथि यो…” 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में था। यह वि भाजन पर आधारि त गीत नहीं है, लेकि न स्वतंत्र भारत के उस मानस को व्यक्त करता है।जिसने 1947 के बाद राष्ट्रीय सीमाओंकी रक्षा को सर्वो च्च कर्तव्य के रूप में देखा। विभाजन के बाद सीमाएँ केवल नक्शेपर बनी रेखाएँनहीं थीं। वे करोड़ों लोगों के जीवन की वास्तवि कता बन गई थीं। 1947 के बाद भारत और पाकि स्तान के बीच संबंधों मेंतनाव और युद्धों नेउस वि भाजन की स्मृति को लगातार जीवित रखा। इसलि ए सैनि कों पर बनेगीतों मेंएक ओर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प है, तो दूसरी ओर उस विभाजित उपमहाद्वीप की लगातार चलती पीड़ा भी कहीं न कहीं मौजूद है।‘संदेसेआते हैं…’फिल्म ‘बॉर्डर’ (1997) का गीत— “संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं…” सैनिक और उसके परिवार के बीच की दूरी का गीत है। लेकिन विभाजन की पीढ़ी के लिए ‘दूरी’ का अर्थ इससे भी बड़ा था।कई परिवारों में दूरी केवल कुछ महीनों या वर्षों की नहीं थी। वे पीढ़ियों तक अपने बिछुड़े रिश्तेदारों सेनहींमि लपाए। एक पत्र सीमा पार नहीं जा सकता था। एक संदेश वर्षों तक नहीं पहुँचता था। किसी भाई को पता नहीं था कि बहन कहाँ है। किसी माँ को नहीं पता था कि उसका बेटा जीवत है या नहीं। इसलिए “संदेसे आते हैं” जैसी भावनाएँ विभाजन की सामूहिक स्मृति से भी जुड़ जाती हैं।विभाजन और ‘माँ’ का रूपकभारतीय सि नेमा मेंमातृभूमि को ‘माँ’ कहनेकी परंपरा पुरानी है। ‘मदर इंडि या’ मेंमाँकेवल परि वार की माँनहीं है;वह भारतीय कि सान समाज और धरती का प्रतीक बन जाती है। वि भाजन ने‘माँ’ के इस रूपक को और जटि ल बना दिया।जिस धरती को माँ माना गया, वही धरती दो राष्ट्रों में बाँट दी गई। एक व्यक्ति कह सकता था—“मेरा देश भारतहै।” दूसरा कह सकता था—“मेरा देश पाकि स्तान है।” लेकिन दोनों की स्मृति यों में कभी-कभी वही नदी, वही खेत, वही भाषा और वही संस्कृति जीवित थी। इसलिए वि भाजन की सबसे गहरी पीड़ा शायद यह थी कि राजनीतिक सीमा ने स्मृतियों का विभाजन नहीं किया। फिल्मी गीतों में‘ बिछड़ना’ : वि भाजन का सबसेमानवीय शब्दवि भाजन को समझने के लिए एक शब्द सबसे महत्वपूर्ण है—बिछड़ना। लोग केवल देश से नहीं बिछड़े। वे— घर सेबिछड़े, परिवार से बिछड़े, दोस्तों से बिछड़े, पड़ोसियों से बिछड़े, अपनी भाषा के वातावरण से बिछड़े, अपनी मिट्टीसे बिछड़े।इसीलिए हिन्दी फिल्मों के प्रेम, विरह और घर-वापसी के अनेक गीत विभाजन की स्मृतियों के साथ नए अर्थग्रहणकरते रहे। गीतों ने उन भावनाओं को शब्द दिए जिन्हें इतिहास की भाषा अक्सर व्यक्त नहीं कर पाती।सिनेमा ने वि भाजन को कैसे याद रखा?विभाजन की प्रत्यक्ष स्मृति पर आधारित फिल्मों में बाद के दशकों में कई महत्वपूर्ण उदाहरण सामने आए। ‘गरमहवा’ (1973) ने वि भाजन के बाद भारत में रह गए एक मुस्लि म परि वार की असुरक्षा और वि स्थापन की मनःस्थि ति को सामनेरखा। ‘तमस’ (1987) ने वि भाजन की हि ंसा को कठोर यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया। ‘अर्थ’ और अन्य फि ल्मों नेअलग-अलग स्तरों पर टूटतेपरि वारों और बदलतेसामाजि क संबंधों को सामनेरखा। बाद में ‘पिजर’ (2003) नेवि भाजन के बीच स्त्री, अपहरण, धर्म और मानवता के प्रश्नों को उठाया। ‘भाग मि ल्खा भाग जैसे सिनेमा ने विभाजन के शरणार्थी बनेएक बच्चेकी कहानी को राष्ट्रीय उपलब्धि की यात्रा से जोड़ा। मिल्खा सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण बन गया कि वि भाजन की राख से भी नई जीवन-गाथा जन्म ले सकती है।विभाजन : पीड़ा से पुनर्निर्माण तकविभाजन की कहानी केवल विनाश की कहानी नहीं है। यह पुनर्निर्माण की कहानी भी है। करोड़ों विस्थापितों ने नए शहर बसाए। नई दुकानें खोलीं। नए उद्योग खड़े किए। बच्चों को पढ़ाया। नई पीढ़ी को आगेबढ़ाया। भारत ने भी अपनी लोकतांत्रि क यात्रा शुरू की। इसलि ए वि भाजन के गीतों मेंआँसूके साथ आशा भी दि खाई देती है। जीवन का प्रेरणादायी जीवंत संघर्ष दिखाई देता है। घर छूटा, लेकिन जीवन नहीं छूटा। मिट्टी छूटी, लेकिन स्मृति नहीं छूटी। रिश्तेटूटे, लेकिन मानवता की संभावना नहीं टूटी। गीतों में बचा हुआ वह हिन्दुस्तान विभाजन की वि भीषि का को केवल मृत्यु और विस्थापन के आँकड़ों सेनहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिएउस बूढ़े व्यक्ति की आँखों में देखना होगा जो आज भी लाहौर की अपनी गली को याद करता है।उस माँ की स्मृति सुननी होगी जि सका बेटा सीमा के उस पार रह गया। दूसरी ओर सेकह सकतेहैंकि बेटा सीमाओंकी रक्षा करतेवहींपर इस दुनि या सेही वि दा हो गया है। बहुत सी स्मृति बंटवारेनेखड़ी की है। उस शरणार्थी परि वार की कहानी सुननी होगी जि सनेदि ल्ली, अमृतसर, जयपुर, मंुबई या कि सी दूसरे शहर में अपना जीवन फि र सेशुरू कि या। और उस गीत को सुनना होगा जि समेंकोई दूर बैठा व्यक्ति कहता है— “ऐ मेरेप्यारेवतन, तुझपेदि ल कुर्बा न…”क्योंकि विभाजन ने नक्शा बाँटा था, स्मृतियाँ नहीं। उसने राजनीतिक सीमाएँ बनाई थीं, भावनाओं की सीमाएँनहीं। उसने लोगों को अलग देशों का नागरिक बना दिया, लेकि न उनकी भाषा, संगीत, भोजन, लोक-स्मृतियों और बचपन की गलियों को एक झटके में अलग नहीं कर पाया।इसीलिए भारतीय सिनेमा के गीतों में विभाजन आज भी कभी वतन की पुकार, कभी घर की याद, कभी बिछड़ेरिश्ते, कभी सैनिक का बलिदान और कभी नई पीढ़ी के पुन र्निर्माण के रूप में सुनाई देता है।“तेरेदामन सेजो आए उन हवाओं को सलाम….” जिस वतन की धरती को मैं छू नहीं सकता, उसकी हवा ही मेरेपास आ जाए तो मैं उसे भी अपने सौभाग्य की तरह स्वीकार करूँगा।यही भाव विभाजन के बाद विस्थापित पीढ़ी की सबसेगहरी पीड़ा को व्यक्त करता है—वतन से दूरी इतनी बढ़ गई कि वहाँ से आती हवा भी मिलन का माध्यम बन गई।इतिहास कहता है—1947 में भारत का विभाजन हुआ। लेकि न गीत कहते हैं—एक पीढ़ी अपने भीतर एक पूरा घर लेकर विस्थापित हुई थी। और शायद यही वि भाजन की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है— सीमा जमीन पर खिची थी, लेकिन उसकी रेखा मनुष्यों के हृदयों पर भी पड़ी। जमीन बँट गई, देश बँट गए, पर स्मृतियों का हिन्दुस्तानआज भी गीतों में, भावना और एहसास में जीवित है। जो कह रहा है कि तुम्हारा प्यारा अखंड भारत कहां है जिसेदिल ढूंढ़ रहा है। जिसे दिल ढूंढ़ रहा है।✍️ लेखक: कैलाश चन्द्र



