
भोपाल | कैलाश चन्द्र (लेखक एवं स्तंभकार)
भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस समय सबसे बड़ा प्रश्न था—आख़िर भारत का नागरिक कौन है? विभाजन के कारण लाखों लोग भारत और पाकिस्तान के बीच आ-जा रहे थे। इसलिए संविधान निर्माताओं ने यह आवश्यक समझा कि संविधान लागू होने के दिन (26 जनवरी 1950) यह स्पष्ट कर दिया जाए कि कौन भारतीय नागरिक माना जाएगा। इसी उद्देश्य से संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता का मूल ढांचा दिया गया। बाद में संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाकर नागरिकता प्राप्त करने, समाप्त होने और उससे जुड़े सभी नियमों का विस्तृत कानून बनाया।
नागरिकता क्या है?
नागरिकता (Citizenship) किसी व्यक्ति और राष्ट्र के बीच का कानूनी एवं संवैधानिक संबंध है। भारतीय नागरिक को मतदान का अधिकार, कुछ संवैधानिक पदों पर नियुक्ति का अधिकार तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी होते हैं।
याद रखें— भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति नागरिक नहीं होता, लेकिन प्रत्येक भारतीय नागरिक भारत में रहने और संविधान के संरक्षण का अधिकारी होता है।
भारतीय संविधान में नागरिकता (अनुच्छेद 5 से 11)
- अनुच्छेद 5 – संविधान लागू होने पर नागरिकता: यह नागरिकता का मूल अनुच्छेद है। इसमें कहा गया कि 26 जनवरी 1950 को वह व्यक्ति भारत का नागरिक होगा जिसका भारत में अधिवास (Domicile) हो तथा वह निम्न में से कोई एक शर्त पूरी करता हो—
- भारत में जन्मा हो।
- उसके माता या पिता में से कोई भारत में जन्मा हो।
- संविधान लागू होने से पहले कम-से-कम पाँच वर्ष तक भारत में सामान्य रूप से निवास किया हो।
(अर्थात नागरिकता के तीन आधार थे—जन्म, वंश और निवास।)
- अनुच्छेद 6 – पाकिस्तान से भारत आने वाले लोग: देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए लाखों लोगों के लिए विशेष प्रावधान बनाया गया। यदि वे निर्धारित शर्तों को पूरा करते थे और भारत में स्थायी रूप से बसना चाहते थे, तो उन्हें भारतीय नागरिकता दी जा सकती थी।
- अनुच्छेद 7 – भारत से पाकिस्तान जाने वाले लोग: जो लोग 1 मार्च 1947 के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए, उन्हें सामान्यतः भारतीय नागरिक नहीं माना गया। हालांकि पुनर्वास की अनुमति लेकर भारत लौटने वालों के लिए विशेष अपवाद रखा गया।
- अनुच्छेद 8 – विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोग: जो लोग विदेशों में रहते थे लेकिन उनके माता-पिता या दादा-दादी भारतीय मूल के थे, वे भारतीय दूतावास में पंजीकरण कराकर निर्धारित शर्तों के अनुसार भारतीय नागरिकता प्राप्त कर सकते थे।
- अनुच्छेद 9 – विदेशी नागरिकता लेने का प्रभाव: यदि कोई भारतीय अपनी इच्छा से किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो वह भारतीय नागरिक नहीं रहेगा। (कारण: भारत पूर्ण दोहरी नागरिकता या Dual Citizenship की व्यवस्था नहीं अपनाता)।
- अनुच्छेद 10 – नागरिकता की निरंतरता: जो व्यक्ति संविधान लागू होने पर भारतीय नागरिक था, उसकी नागरिकता बनी रहेगी, लेकिन संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन।
- अनुच्छेद 11 – संसद की शक्ति: इस अनुच्छेद ने संसद को नागरिकता पर विस्तृत कानून बनाने का अधिकार दिया। इसी अधिकार के आधार पर नागरिकता अधिनियम, 1955 बनाया गया।
नागरिकता अधिनियम, 1955
यह भारत का मुख्य नागरिकता कानून है। इसके अनुसार भारतीय नागरिकता पाँच प्रमुख तरीकों से प्राप्त की जा सकती है:
- जन्म से (By Birth)
- वंश से (By Descent)
- पंजीकरण द्वारा (By Registration)
- प्राकृतिककरण द्वारा (By Naturalisation)
- किसी नए क्षेत्र के भारत में विलय होने पर (By Incorporation of Territory)
कानून में प्रमुख संशोधन
- 1955: नागरिकता अधिनियम लागू हुआ।
- 1986: जन्म से नागरिकता के नियम अधिक कठोर किए गए।
- 1992: वंश से नागरिकता संबंधी नियमों में संशोधन किया गया।
- 2003: ‘अवैध प्रवासी’ (Illegal Migrant) की परिभाषा स्पष्ट की गई तथा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय पहचान रजिस्टर से संबंधित प्रावधान जोड़े गए।
- 2005: OCI (Overseas Citizen of India) की व्यवस्था प्रारंभ हुई। (ध्यान रहे, OCI पूर्ण भारतीय नागरिकता नहीं है। OCI धारक मतदान नहीं कर सकते, चुनाव नहीं लड़ सकते और कुछ संवैधानिक पदों पर नियुक्त नहीं हो सकते।)
- 2015: PIO और OCI योजनाओं का एकीकरण किया गया।
- 2019: नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) पारित हुआ। इसके अंतर्गत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए कुछ धार्मिक समुदायों के पात्र व्यक्तियों के लिए विशेष प्रावधान किया गया।
- 2024: CAA लागू करने के नियम अधिसूचित किए गए तथा पात्र व्यक्तियों के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
क्या आधार कार्ड, वोटर कार्ड या पैन कार्ड नागरिकता का प्रमाण हैं?
यह सबसे बड़ा भ्रम है। बहुत से लोग मान लेते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड, राशन कार्ड या आयकर रसीद है, तो वह स्वतः भारतीय नागरिक है। यह धारणा कानूनी रूप से सही नहीं है। इन सभी दस्तावेज़ों का उद्देश्य अलग-अलग है:
- आधार कार्ड: व्यक्ति की पहचान (Identity) स्थापित करने के लिए है।
- पैन कार्ड: आयकर संबंधी पहचान के लिए है।
- राशन कार्ड: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का लाभ देने के लिए है।
- मतदाता पहचान-पत्र (Voter ID): मतदान प्रक्रिया के लिए है।
- आयकर रसीद: केवल यह बताती है कि किसी व्यक्ति ने कर का भुगतान किया है।
इनमें से कोई भी दस्तावेज़ अपने-आप भारतीय नागरिकता प्रदान नहीं करता। किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण केवल भारतीय संविधान, नागरिकता अधिनियम, 1955 तथा उसके अंतर्गत बने नियमों के अनुसार किया जाता है। यदि किसी कारण से नागरिकता का प्रश्न उठता है, तो सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध वैधानिक अभिलेखों, साक्ष्यों और कानून के अनुसार निर्णय करता है। निष्कर्षतः पहचान (Identity), निवास (Residence), करदाता (Taxpayer), मतदाता (Elector) और नागरिक (Citizen)—ये पाँचों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं। इन्हें एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।विषय का सार
भारतीय संविधान का भाग II नागरिकता की संवैधानिक नींव है, जबकि नागरिकता अधिनियम, 1955 उसका विस्तृत कानूनी स्वरूप है। संविधान ने यह निर्धारित किया कि 26 जनवरी 1950 को कौन भारतीय नागरिक होगा और संसद को भविष्य के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझनी चाहिए कि भारतीय नागरिकता किसी पहचान-पत्र से नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकता अधिनियम द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से प्राप्त होती है। आधार, पैन, राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र या आयकर रसीद महत्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज़ अवश्य हैं, पर वे स्वयं नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। नागरिकता का प्रश्न केवल कानून, वैधानिक अभिलेखों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय से तय होता है। यही संवैधानिक व्यवस्था भारत में विधि के शासन (Rule of Law) की आधारशिला है।



