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संपादकीय

जनसांख्यिकी परिवर्तन और राष्ट्रीय सुरक्षा: क्या भारत में लागू होगी समान जनसंख्या नीति? पढ़ें कैलाश चन्द्र का विशेष विश्लेषणात्मक लेख

हरियाणा। हरियाणा के ऐतिहासिक समालखा में 24–26 जुलाई 2026 को सम्पन्न राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय कार्यकारिणी एवं प्रतिनिधि मंडल की बैठक केवल एक संगठनात्मक समीक्षा तक सीमित नहीं रही। इस बैठक ने भारत के भविष्य से जुड़े एक अत्यंत गंभीर विषय—जनसंख्या असंतुलन एवं जनसांख्यिकीय परिवर्तन—को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का बड़ा प्रयास किया है। संगठन का विस्तार और एक अहम प्रस्तावबैठक में देश के 40 प्रांतों से 488 प्रतिनिधियों की उपस्थिति और समिति के 90 वर्ष पूर्ण होने की पृष्ठभूमि पर चर्चा हुई।

कार्य-विस्तार की समीक्षा में यह तथ्य सामने आया कि वर्तमान में समिति का कार्य 852 जिलों तक पहुँच चुका है, जहाँ 4,886 शाखाएँ और 1,173 मिलन नियमित रूप से चल रहे हैं। सामाजिक संगठन की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। किन्तु बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह प्रस्ताव रहा, जिसमें  जनसंख्या असंतुलन को राष्ट्रीय संकट बताते हुए सभी समुदायों के लिए समान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति तथा समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का आग्रह किया गया।

यह प्रस्ताव भारत में लंबे समय से चल रहे उस विमर्श को पुनः सामने लाता है कि क्या जनसांख्यिकीय परिवर्तन केवल एक सांख्यिकीय (Statistical) विषय है, या इसका सीधा प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और विकास नीति पर पड़ता है। भारत के सामने प्रमुख जनसांख्यिकीय चुनौतियाँभारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, परंतु राष्ट्रीय नीति का प्रश्न केवल कुल जनसंख्या नहीं, बल्कि उसकी संरचना (Population Structure), आयु-वितरण, क्षेत्रीय वितरण और प्रजनन दर से भी जुड़ा है।

आज भारत अनेक प्रकार की जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है:

घटती जन्मदर

कुछ राज्यों में जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level Fertility) से नीचे पहुँच चुकी है।पारिवारिक संरचना में बदलावअनेक क्षेत्रों में युवाओं का विवाह विलंबित हो रहा है और परिवार का आकार लगातार छोटा होता जा रहा है।

पलायन का दबाव

ग्रामीण क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर महानगरों की ओर पलायन सामाजिक एवं आर्थिक असंतुलन उत्पन्न कर रहा है। अवैध प्रवासनसीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासन (Illegal Immigration) पर समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर चिंता व्यक्त की जाती रही है।

वृद्ध होती आबादी

भारत अभी “युवा राष्ट्र” है, पर आने वाले दशकों में वृद्धजन आबादी तेजी से बढ़ने का अनुमान है, जिससे सामाजिक सुरक्षा की नई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।क्षेत्रीय असमानताएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण तथा रोजगार के अवसरों में क्षेत्रीय असमानताएँ भी जनसांख्यिकीय परिवर्तन को प्रभावित करती हैं।

समान नागरिक संहिता और पारदर्शी नीतियों की आवश्यकताइन्हीं संदर्भों में राष्ट्र सेविका समिति ने अपने प्रस्ताव में जनसंख्या नीति, अवैध घुसपैठ, सामाजिक जागरूकता तथा समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे विषयों को राष्ट्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है। समाज को परिवार संस्था के प्रति उत्तरदायित्व, समय पर विवाह और सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है।

हालाँकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जनसांख्यिकी का प्रश्न केवल भावनात्मक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक अध्ययन का विषय है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनसंख्या संबंधी नीतियाँ समानता, मौलिक अधिकारों, महिलाओं की स्वायत्तता और विश्वसनीय आँकड़ों के आधार पर निर्मित होती हैं।निष्कर्ष: तथ्य और संवाद पर आधारित हो विमर्शराष्ट्र निर्माण केवल शासन का कार्य नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है।

यदि भारत को आगामी शताब्दी में जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) का पूर्ण उपयोग करना है, तो उसे शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन, सीमाओं की सुरक्षा और एक संतुलित जनसंख्या नीति पर काम करना होगा। कुरुक्षेत्र की पावन भूमि से अपने समापन उद्बोधन में वंदनीया प्रमुख संचालिका शांता कुमारी ने संगठन के कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे राष्ट्रहित में गुणवत्तापूर्ण कार्य-विस्तार का संकल्प लें। आने वाला भारत केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और दूरदर्शी जननीति से निर्मित होगा।

अंततः, जनसांख्यिकी केवल संख्या का विज्ञान नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की दिशा का संकेतक है। यदि इस विषय की उपेक्षा हुई, तो यही परिवर्तन सामाजिक व प्रशासनिक चुनौतियों का कारण बन सकता है। इसलिए आवश्यकता भय या विवाद की नहीं, बल्कि तथ्य, संवाद और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर आधारित ठोस नीति-विमर्श की है।

Bol CG Desk (L.S.)

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